बहुत समझाया पर वो नहीं मानी
ज़िद्दी थी बहुत, जो सरकी न कानी
हाथों की लकीर सच ही वो ज़हीर
इससे पहले जाते नीचे, तो छोड़ जाते तीर।
उलझन सी बन गयी थी रस्सी, इसीलिए काटी है
अक्ल की बड़ी बनती थी, इसलिए हमने छोड़ी है
अक्ल की बड़ी बनती थी, इसलिए हमने छोड़ी है
अक्ल की बड़ी बनती थी, इसलिए हमने छोड़ी है।
खरीदारी की शौकीन थी, कार ढूंढती थी
हर पल लड़ती थी, खून जलाती थी
खरीदारी की शौकीन थी, कार ढूंढती थी
हर पल लड़ती थी, खून जलाती थी।
हर पल लड़ती थी खून...