Zara Faasley Te

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Zara Faasley Te

by Satinder Sartaj

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लंग गए महीने येही चली जाते फेरे हमें काम और क्या कहे ना ही होता ना ही होता भाई नज़दीक कैसे मसलों ने छेड़ा हुईं कोशिशें भी वैसे एक दो नहीं कुछ तो करो ये काम नहीं उसके वश का रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता ज़रा फासले पर जाता है खड़ा नहीं अरमानों को छिपा और ज़रा सा हँसता रहता है रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता नज़रों को मिलाने का भी करता नहीं जो वो अरे तेरे शेरा हम उसे वैसे मौका दिया ही बहुत डाला इश्क़ का घेरा वैसे पास आकर जाता चुप हो वो जताता नहीं प्यार पता नहीं कौन सा नाग डँसता रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता ज़रा फासले पर जाता है खड़ा नहीं अरमानों को छिपा और ज़रा सा हँसता रहता है रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता सजा फंदा उसके लिए कि शायद कुछ बोले नहीं वो दिलों की टटोलता वैसे हमें देखता रहता है होकर ओझल और वो गाता रहता है बोल लें गले वाली माला पिरो सुनो नहीं लड़कियों शरीफ़ बेटा मेरी सास का रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता ज़रा फासले पर जाता है खड़ा नहीं अरमानों को छिपा और ज़रा सा हँसता रहता है रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता बहुत तंग करता ख़यालों में आकर नहीं वो सपने रंग कर और सरताज वाले नगमे सुनाकर सच में रूहों को रंग कर नहीं वो चाँद और मैं उसकी परछाई ये नाज़ुक है चाहत दिलों के अम्बरों पर बसता रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता ज़रा फासले पर जाता है खड़ा नहीं अरमानों को छिपा और ज़रा सा हँसता रहता है रोज़ रहती है उम्मीद जिसकी वो आँखों ने पढ़ी जो ना पूछता ना बात बताता